॥ श्री गुरुभ्यो नमः ॥उत्तराखंड, भारत
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श्रीविद्या

श्री चक्र · श्री यंत्र

श्रीविद्या में माँ, सृष्टि और अंतर्मुखी यात्रा के चिंतन का पवित्र स्वरूप।

Shri Yantra — traditional geometric diagram
चित्र का स्रोत · CC BY-SA 3.0
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पवित्र रचना को समझना

श्री चक्र में परस्पर जुड़े त्रिकोण, कमल के आवरण, बाहरी सीमा और केंद्र में बिंदु होता है। चार मुख्य त्रिकोण ऊपर और पाँच नीचे की ओर होते हैं। इनका संबंध पारंपरिक रूप से शिव और शक्ति के माध्यम से समझा जाता है। पूरी रचना में प्रत्येक आवरण का उपासना में अपना स्थान है।

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नौ आवरण और बिंदु

नवावरण का अर्थ श्री चक्र के नौ आवरण हैं। बाहरी रचना से केंद्रीय बिंदु की ओर उपासना का अंतर्मुखी भाव प्रकट होता है। नौ मुख्य त्रिकोण और नौ आवरण चित्र के अलग पहलुओं का वर्णन करते हैं। इन शब्दों को समझने से आगे का अध्ययन अधिक स्पष्ट होता है।

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बाहरी पूजा और अंतर्मुखी चिंतन

श्रीविद्या साहित्य में पवित्र रचना का संबंध उपासक के जीवन से जोड़ा गया है। भावनोपनिषद इस चिंतन का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इससे प्रश्न उठता है कि उपासना का अर्थ हमारी सजगता, भावना और आचरण में कैसे आए। बाहरी स्वरूप को सीखने के साथ अध्ययन और मनन भी चल सकते हैं।

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यंत्र की उपासना सीखना

अध्ययन के लिए स्पष्ट और सही रचना वाला चित्र उपयोगी है। विधिवत उपासना में यंत्र का चयन, स्थापना और पूजा अपनी परंपरा के मार्गदर्शन से की जाती है। यंत्र को समझने का आरंभिक उद्देश्य श्रद्धा के साथ सजगता लाना है, ताकि उपासना की भावना और गहरी हो।

आगे का अध्ययनShri Chakra and Human Body, Part 3 — Manblunder ↗Shri Chakra and Human Body, Part 5 — Manblunder ↗Navavarana — Srividya Learning Centre ↗

श्रद्धा से शुरुआत

सच्ची भावना से साधना की शुरुआत होती है।

अपना परिचय दें और आगे की साधना के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करें।

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