॥ श्री गुरुभ्यो नमः ॥उत्तराखंड, भारत
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श्रीविद्या

ललिता त्रिपुरसुंदरी देवी

श्रीविद्या के केंद्र में माँ—भक्ति में आराध्या और चिंतन में चेतना का स्वरूप।

Lalita Tripurasundari Devi — traditional devotional image
चित्र का स्रोत · CC BY-SA 4.0
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माँ और राजराजेश्वरी

ललिता सहस्रनाम का आरंभ श्रीमाता और श्रीमहाराज्ञी नामों से होता है। माँ और महारानी के इन संबोधनों में आत्मीयता और आदर साथ आते हैं। साधक संतान के विश्वास से माँ के पास आता है और उनके नामों तथा स्वरूपों में सृष्टि की पवित्र व्यवस्था का चिंतन करता है।

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स्वरूप में निहित अर्थ

ललिता के परिचित स्वरूप में गन्ने का धनुष, पुष्पबाण, पाश और अंकुश हैं। पारंपरिक चिंतन में इनका संबंध मन, इंद्रिय अनुभव, आकर्षण और निर्देशन से जोड़ा जाता है। स्वरूप का धीरे-धीरे अध्ययन करने से ध्यान और इच्छाओं के हमारे जीवन पर प्रभाव को समझने का अवसर मिलता है।

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उपासना का समग्र स्वरूप

माँ की उपासना उनके स्वरूप, नाम, मंत्र और श्री चक्र के माध्यम से की जाती है। ललिता सहस्रनाम में भक्ति और तत्त्वचिंतन साथ मिलते हैं। एक नाम को पढ़कर उस पर विचार किया जा सकता है और फिर दोबारा समझा जा सकता है। आसपास के नाम उसके अर्थ को और स्पष्ट करते हैं।

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भक्ति को जीवन में उतारना

माँ से संबंध अपने दायित्वों में सावधानी, कृतज्ञता और सजग आचरण के माध्यम से भी जीया जाता है। नियमित उपासना इस संबंध को दैनिक जीवन में स्थान देती है। गुरु का मार्गदर्शन, सच्चे प्रश्न और सीखे हुए ज्ञान पर ध्यान देने से अध्ययन और साधना साथ परिपक्व होते हैं।

आगे का अध्ययनLalita Sahasranama 1–2 — Manblunder ↗Lalita Sahasranama — traditional text ↗

श्रद्धा से शुरुआत

सच्ची भावना से साधना की शुरुआत होती है।

अपना परिचय दें और आगे की साधना के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करें।

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