नवावरण का अर्थ
नव का अर्थ नौ और आवरण का अर्थ घेरा है। नवावरण पूजन में श्री चक्र के नौ आवरणों और उनसे संबंधित देवियों के माध्यम से माँ की उपासना होती है। यंत्र, नाम, अर्पण और चिंतन एक क्रमबद्ध पूजा में जुड़ते हैं, जिसकी विधि गुरु परंपरा से सीखी जाती है।
बाहरी सीमा से केंद्र की ओर
श्री चक्र के आवरण उपासक का ध्यान अंतर्मुखी करते हैं। बाहरी रचना से आगे बढ़ते हुए केंद्र के बिंदु का भाव आता है। साधक इसे बिखरे मन को माँ के प्रति एकाग्र करने की दृष्टि से समझ सकता है। प्रत्येक आवरण का विशिष्ट अर्थ अध्ययन से स्पष्ट होता है।
अर्थ और विधि साथ-साथ
पूजा की भाषा समझने पर उसका भाव अधिक स्पष्ट होता है। आवाहन में स्वागत, अर्पण में आदर और समापन में कृतज्ञता तथा समर्पण का भाव है। विस्तृत पूजा में इनका विशिष्ट पारंपरिक स्वरूप होता है। उद्देश्य समझने से सीखते समय भी भागीदारी सजग और भावपूर्ण बनती है।
मार्गदर्शन में सीखा जाने वाला पूजन
नवावरण पूजन का स्वरूप गुरु के निर्देश और शिष्य की तैयारी के अनुसार सीखा जाता है। इसमें उच्चारण, आवरणों की पहचान और अर्पण का अर्थ समझना शामिल हो सकता है। इन आधारों पर नियमित ध्यान देने से अभ्यास में स्पष्टता आती है। अध्ययन के प्रश्न गुरु के सामने सरलता से रखे जा सकते हैं।
