बटुक भैरव
भैरव उपासना सजगता, साहस और साधना की जिम्मेदारी को साथ लाती है। बटुक भैरव से भक्तिमय संबंध गुरु द्वारा दिए गए अभ्यास में प्रकट होता है। दैनिक आचरण और साधना स्थल की पवित्रता के प्रति ध्यान इस संबंध को पुष्ट करते हैं।
श्रीविद्या में स्थान
यहाँ अपनाए गए क्रम में बटुक भैरव साधना श्री महागणपति के बाद और बाला त्रिपुरसुंदरी देवी से पहले आती है। गुरु शिष्य की तैयारी के अनुसार अभ्यास स्थापित करते हैं। इस क्रमबद्धता से प्रत्येक निर्देश को समग्र साधना में स्पष्ट स्थान मिलता है।
मार्गदर्शन के साथ अभ्यास
मंत्र, पूजा विधि और विशेष अनुशासन व्यक्तिगत निर्देश से प्राप्त किए जाते हैं। मार्गदर्शन लेते समय अपनी वर्तमान भैरव या शिव उपासना की जानकारी दें। योगिनी ब्रह्मांशी आगे के अभ्यास को हिमालयन सिद्धाश्रम गुरु परंपरा और पहले से प्राप्त साधना के साथ जोड़ती हैं।
